राजस्थान विकास के पाँच वर्ष

”इस पथ का उद्देश्य नहीं है

श्रान्त भवन में टिक जाना,

किन्तु पहुँचना उस सीमा तक,

जिसके आगे राह नहीं हो।”

कवि जयशंकर प्रसाद इन पंक्तियों में विकास की महत्व पर प्रकाश डालते हुए इस तथ्य को स्पष्ट रूप से प्रमाणित करते हैं कि विकास एक सतत्‌ क्रम है, एक निरंतर प्रकिया जिसका कोई विराम नहीं है।

इस विकास क्र का उद्गम सदियों पहले हुआ था परन्तु इसकी गति में प्रभावी विकास के घोतक साधनों का उचित प्रयोग नहीं था। आजादी पाने के साथ-साथ देश व सभी प्रांतों में एक नव-चेतना का आगाज हुआ और शनै:-शनै: सभी प्रांत प्रगति पथ पर अग्रसर होने लगे। फलत: हमारे राष्ट्र का विकास बढ़ता गया और आशा की किरण आने लगी कि हम शीघ्र ही विकसित देशों में अपना स्थान बना लेंगे। इस विश्वास को और सुदृढ़ करने के लिए पिछले पाँच वर्षों में प्रगति अत्यंत तेजी से बढ़ी है। यदि हमारा राज्य इस गति से विकास पथ की ओर उन्मुख रहा तो विकसित राष्ट्र के रूप में भारत शीघ्र ही अंकित हो जाएगा। संकल्प है तो मात्र यहीं कि प्रगति का यह क्रम बिना किसी अवरोध के निरंतर चलता रहे।

जवाहर लाल नेहरू जी के शब्दों में हमारा सही संकल्प यही होगा-

“At the stroke of the midright hour whin the whole world stups, India shall arise to life & freedom we have to built the noble mason where all hir children may dwell.”

राष्ट्र के इस संकल्प के लिए आवश्यक है कि प्रत्येक प्रांत इस कार्य में पूर्ण सहयोग प्रदान करे और यह सहयोग हमारे राज्य की ओर से सदैव रहा है व रहेगा। गत पाँच वर्षों में हमारे राज्य ने जो कीर्तिमान अर्जित किए वे कुछ इस प्रकार से हैं-

1. आधारभूत ढाँचे का विकास:- सड़क- वर्ष 200-01 में 1117 किमी. सड़कों का नवीनीकरण केन्द्रीय सड़क निधि से राज्य में 1075 कि.मी. सड़कों का सुदृढ़ीकरण एक पुल व 22 छोटी पुलियाओं का निर्माण राज्य कृषि विपणन बोर्ड दव्ारा संपर्क सड़कों के निर्माण पर 268.13 करोड़ रुपये व्यय कर 3759 किलोमीटर सड़कों का निर्माण किया गया। बी.ओ.टी. पर आधारित योजना के तहत 78.24 करोड़ रुपये की 8 परियोजनाएँ पूर्ण कर यातायात के लिए खोली गई।

ग्रामीण क्षेत्रों के लिए प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत एक हजार से अधिक आबादी के सभी गाँवों को वर्ष 2003 व 500 से 1000 की आबादी वाले गाँवों को वर्ष 2007 तक पक्की सड़कों से जोड़ा जाएगा।

2. ऊर्जा क्षेत्र सुधार:- विद्युत उत्पादन वृदव् के लिए सतत्‌ प्रयास किए गए हैं। पिछले पाँच वर्षों की तुलना में विद्युत उत्पादन में पाँच वर्षों में दुगुना विकास कार्य हुआ है जो कि 1302 मेगावाट से 2572 मेगावट हुआ है। सूरतगढ़ तापीय विद्युत परियोजना कि प्रति वर्ष 250 मेगावाट की एक-एक ईकाई से उत्पादन प्राप्त करने का कार्य निश्चित किया गया। दो सौ मेगावाट की प्रथम ईकाई फरवरी 1999 में प्रारंभ हुई। दव्तीय ईकाई छ: माह पूर्व ही समाप्त हो गई व 80 करोड़ रुपये की बचत, तीसरी ईकाई का कार्य पाँच माह पूर्व ही पूर्ण हुआ व 80 करोड़ रुपये की बचत, चौथी ईकाइ छ: माह पूर्व ही पूर्ण हुई व पुन: 80 करोड़ रु. की बचत, पाँचवी ईकाई 29 माह में पूर्ण हुई व 100 करोड़ रु. की बचत दर्ज की गई। इसके बाद इसे राज्य का प्रथम सुपर थर्मल पावर स्टेशन बनाया गया। वर्ष 2002-03 में भारत सरकार विद्युत मंत्रालय से तीसरी बार स्वर्ण पदक प्राप्त हुआ।

कोटा थर्मल को देश के इतिहास में सबसे कम समय में पूर्ण होने वाली परियोजना के रुप में देखा गया। उसकी 195 मेगावाट की छठी ईकाई का निर्माण 24 माह में कर कीर्तिमान स्थापित किया गया। गिरल (बाड़मेर) लिग्नाईट आधारित विद्युत परियोजना का कार्य प्रारंभ किया गया। यह राज्य का प्रथम लिग्नाईट पावर प्रोजेक्ट है व प्रथम वर्ष में इससे उत्पादन पर 2.45 रुपये प्रति यूनिट अनुमानित हैं।

रावगढ़ गैस थर्मल पावर स्टेशन दव्तीय चरण (2×37.5 मेगावाट) को 24 माह में पूर्ण किया । इसकी अनुमानित लागत 300 करोड़ रुपये की जगह 220 करोड़ रुपये आई अत: 80 करोड़ रुपये की बचत दर्ज हुई।

धौलपुर गैस थर्मल परियोजना का कार्य प्रारंभ किया गया है, इसकी अनुमानित लागत 1155 करोड़ रुपये है व 3.30 मेगावाट का विद्युत उत्पादन करने में सक्षम है।

राज्य में 72.73 मेगावाट की पवन ऊर्जा स्थापित परियोजनाएँ है जिसमें 2.25 मेगावट की पवन विद्युत आधारित परियोजना देवगढ़ (चित्तौड) में स्थापित की गई।

7.8 मेगावाट की प्रथम बायोमास परियोजना प्रारंभ की गई। प्रधानमंत्री ग्रामीण योजना के तहत 22 गाँव केंन्द्रीकृत सौर ऊर्जा पद्धति से विद्युतिकृत किए गए, 2003-04 में 38 अन्य गाँवों के विद्युतिकरण का लक्ष्य निर्धारित किया गया। 95 प्रतिशत गाँव विद्युतिकृत किए गए। 8 लाख घरेलू, 1 लाख वाणिज्यिव, 1.26 लाख अन्य कनेक्शन, 756 हरिजन बस्तियों का विद्युतिकरण किया गया। गरीबी रेखा के नीचे 64 हजार परिवारों को कुटीर ज्योति कनेक्शन प्रदान किए गए। सभी शहरों व औद्योगिक क्षेत्रों में 24 घंटे व ग्रामीण में 15 घंटे बिजली प्रदान की गई।

2002-03 में प्लाट लोड फैक्टर 88.01 प्रतिशत आया जो कि सबसे अधिकतम है, तेल खपत-0.431 मिलीलीटर प्रति यूनिट है जो कि सबसे न्यूनतम है फ्लाई एश का उपयोग 80 प्रतिशत तक किया गया। वर्ष 2002-03 में राज्य में विद्युत उत्पादन निगम दव्ारा संचालित तापीय विद्युत गृहों से 88.49 प्रतिशत पी. एल. एफ. अर्जित कर देश में दूसरा स्थान पगाप्त किया है।

प्रसारण तंत्र सुदृढ़ीकरण हेतु पचास वर्षों की अवधि में जी. एस. एस. क्षमता में 5 वर्षों 50 प्रतिशत वृदव् हुई है। 400 केवी की दो, 220 केवी के ग्यारह, 1.32 केवी के इकसठ व 33 केवी के पाँच सौ इकसठ ग्रिड सबस्टेशन स्थापित किए गए हैं।

3. जल संसाधन विकास:- सरकार की नवीन निर्देशिका ’बरसाजन सहभागिता’ के अनुसार 84 योग्य पंचायत समितियों में 320 नए पॉयलट जलग्रहण क्षेत्रों में कार्य प्रारंभ, 2002-03 में शेष पंचायत समितियों में 800 नवीन पॉयलट जलग्रहण क्षेत्रों के चयन की कार्यवाही की गई।

इंदिरा गांधी नहर परियोजना के दव्तीय चरण की लिफ्ट नहरों को पम्पिंग स्टेशनों में तीन फीट नहरों को पांच पम्पिंग स्टेशनों से जल प्रवाह का कार्य शुरू किया गया। बागड़सर लिफ्ट नहर का कार्य पूर्ण कर लिया गया है। इससे 10.350 हैक्येटर क्षेत्र में सिंचाई सुविधा तथा 19 गाँवों में 5,730 आबादी को पेयजल सुविधा उपलब्ध हुई। कोलायत लिफ्ट नहर पर 2 पम्पिंग स्टेशनों का कार्य पूर्ण हुआ। इससे 8,747 हैक्येटर में सिंचाई एवं 7900 आबादी को पेयजल सुविधा उपलब्ध।

राजस्थान जलक्षेत्र पुन: संरचना परियोजना के अन्तर्गत 612 जल प्रबन्धन समितियों का गठन हुआ। 91 नहर प्रणाली एवं- 16 बाँधों को जीर्णोद्धार व 6.14 लाख हैक्येटर कृषि सिंचाई को लाभ। पोषित सिदव्मुख नहर परियोजना जुलाई 2002 में राष्ट्र को समर्पित। परम्परागत जल स्त्रोतों के 3388 सुधार कार्य पूर्ण किए गए जिन पर 45.70 करोड़ रुपये व्यय हुआ। 19 फरवरी, 1999 को राज्य जल नीति घोषित एवं विभागीय वेबसाइट प्रारंभ की गई। वाटर हार्वेस्टिंग स्ट्रक्चर के 4863 कार्यों में से 16327 कार्य पूर्ण हुए जिनकी लागत 380 करोड़ रुपये आई। जारकम, सिदव्मुख, सोम-कमला-अंबा, जयसंमद व गंभीरी की आधुनिकरण परियोजना पूर्ण कर 19960 हैक्येटर क्षेत्र में अतिरिक्त सिंचाई क्षमता का सर्जन किया गया।

कोटा बैसज (चम्बल नदी) के जल के उपयोग हेतु म.प्र. में 10 प्रतिशत जल ग्रहण क्षेत्र की आवक के आधार पर उपयोग हेतु ऐतिहासिक समझौता किया गया।

4. शिक्षा व साक्षरता:- 28 जिले सतत्‌ शिक्षा कार्यक्रम से जुड़े है फलत: प्रदेश पुरुष साक्षरता दर 1991 की 51.44 से बढ़कर 2001 में 76.84 प्रतिशत हुई, महिला साक्षरता दर 1941 की 20.44 प्रतिशत से बढ़कर 2001 में 44.4 प्रतिशत हुई जो कि 120 प्रतिशत की वृदव् है। अत: प्रदेश की कुल साक्षरता 61.03 हुई है। 15-35 आयु वर्ग के 66 लाख व्यक्ति साक्षर हुए है। योजनाओं के तहत वर्ष 2003 तक। सभी बच्चों का विद्यालयों में नामंकन वर्ष 2007 तक सभी को 5वीं कक्षा तक तथा वर्ष 2010 तक सभी को आठवीं कक्षा तक शिक्षा दिलाने का प्रयास किया गया है। वर्ष 1998-99 से राजीव गांधी जंयती पाठशाला योजना प्रारंभ हुई जिसमें 21,453 पाठशालाएँ खुली जिनमें 8 लाख बच्चों का नामंकन हुआ, 10122 भवनों का निर्माण हुआ। पैराटिचर्स की आय 1200 से बढ़कार 1600 रुपये की गई जिन्होंने 2 साल की सेवा अवधि पूर्ण की है। जून, 2002 तक 79.52 लाख व्यक्तियों को साक्षरता कार्यक्रम के अन्तर्गत लाभान्वित किया गया। उर्दू भाषा की उन्नति हेतु 600 अध्यापकों के पद की स्वीकृति। कक्षा 11वीं व 12वीं के छात्रों के लिए कम्पूटर विज्ञान विषय अनिवार्य किया गया। 11 नए इंजीनियंरिग कॉलेज प्रारंभ, एक नया संस्कृत विश्वविद्यालय व कृषि विश्वद्यािलय की उदयपुर में स्थापना की गई। 4 संसाधनों में बायोटेकनोलॉजी पाठयक्रम 2003 से प्रारंभ किया गया जिसमें 150 छात्रों की प्रवेश क्षमता है। 3 निजी फामेर्सी संसधान स्थापित व प्रवेश क्षमता 960 छात्र प्रतिवर्ष है। 5 औद्योगिक प्रशिक्षण संसधान प्रारंभ, 9 निजी प्रबन्धन संसधान स्थापित, 25 स्थानों पर सूचना प्रोद्यौगिक का पाठयक्रम प्रारंभ किया गया। शिक्षा आपके दव्ार के तहत मोबाइल स्कूल, शिक्षा गारन्टी योजना के तहत 32 जिलों में समयबदव् नियोजित शैक्षिक गतिविधि सर्व शिक्षा अभियान से प्राथमिक व उच्च प्राथमिक को संवैधानिक अधिकार के तहत प्रत्येक बच्चे को आठवीं कक्षा तक नि:शुल्क शिक्षा का प्रावधान।

5. स्वास्थ्य:- मेडिकल रिलीफ कार्ड योजनान्तर्गत अगस्त 2001 तक 23.47 लाख परिवार चिन्हित व 23 लाख से अधिक मेडीकेयर रिलीफ कार्ड वितरित व 111 लाख रुपये की नि:शुल्क चिकित्सा। 46865 कुष्ठ रोगियों का उपचार, 40814 क्षय रोगियों की पहचान व 19,000 क्षय रोगियों का उपचार, मलेरिया के लिए 20284 नि:शुल्क औषधि वितरण केन्द्र 1206 ज्वर उपचार केन्द्र, 1425 मलेरिया क्लिनिक, 197 भ्रमणशील दल कार्यरत। पोलियों के लिए 7 करोड़ रुपये का प्रावधान कर 25,000 ऑपरेशन। 43 सरकारी व 10 निजी रक्त बैंक में एच.आई.वी. मुफ्त रक्त उपलब्ध। 47851 विद्यालयों में 45 लाख विद्यार्थियों का स्वास्थ्य परीक्षण सम्पन्न। राज्य में जनसंख्या स्थायीत्व के हेतु राजीव गांधी जनसंख्या नियंत्रण मिशन। एड्‌स नियंत्रण कार्यक्रम हेतु विश्व बैंक की सहायता से 86 करोड़ रुपये की योजना स्वीकृत। ग्रामीण क्षेत्रों में 276 एवं शहरी क्षेत्रों में 9 उपस्वास्थ्य केन्द्र खोले गए। सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों पर 286 शैयाएँ बढ़ाई गई, 13 एक्सरे मशीनें, 100 कैलोरीमीटर, 1 सेटेलाइट अस्पताल व तीन 300 एम.ए. की एक्सरे मशीने सुलभ कराई गई।

6. पंचायतीराज:- को अधिक वित्तीय व प्रशासनिक शक्तियां प्रदान कर सुदृढ़ बनाया गया। संविधान की ग्याहरवीं अनूसूची के 29 विषयों में से 16 विषयों के कार्य पंचायतों को हस्तान्तरित किए गए। प्रारम्भिक शिक्षा का संपूर्ण काम पंचायतीराज को दिया गया। पंचायती संस्थाओं के चुनाव में अजा जजा के 15 प्रतिशत आरक्षण को बढ़ाकर 21 प्रतिशत किया गया। ग्रामीण विकास के लिए वार्ड ग्राम सभाओं का गठन किया गया। अधिकांश में ग्राम सेवक पदेन सचिव को सेवाएं उपलब्ध कराई गई। प्रथम बार चरागाह प्रबन्धन समिति का गठन हुआ जिसमें महिलाएं भी सदस्य बनी।

7. सामाजिक सुरक्षा:- कमजोर वर्गों के हितों की रक्षा व विकास के लिए। कमजोर वर्गों को ऋण व अनुदान उपलब्ध करना स्वरोजगार हेतु प्रशिक्षण देना, अन्याय रोकना, पोषाहार स्तर में सुधार करना, वृद्धों व विधवाओं को पेंशन प्रदान करना, शिक्षा व तकनीकी संबंधी जानकारी एवं छात्रावास विकास कार्य।

8. अकाल प्रबंधन:- राहत कार्यों पर बी.पी.एल. परिवारों के अलावा अन्य गरीब परिवारों के लोगों को ग्राम पंचायत के अनुमोदन पर रोजगार देने का निर्णय। 18 जिलों के 9964 गाँवों को अभावग्रस्त घोषित किया गया, इसके लिए कुल 24672 राहत कार्य चलाकर 6.13 लाख लोगों को रोजगार उपलब्ध कराया गया। संवत्‌ 2057,56,55 में क्रमश: 2079,2777 एवं 253 चारा डिपो खोलकर अनुदानित दरों पर चारा वितरित किया गया। संवत्‌ 2056 व 2057 में क्रमश: 606 व 727 पशु शिविर खोलकर क्रमश: 212864 एवं 275242 पशुओं को लाभान्वित किया गया। पेयजल, परिवहन सुविधा 1739 टेंकरों के माध्यम से 2187 ग्रामों में उपलब्ध। गत 3 वर्षों में रेल दव्ारा पेयजल के नि:शुल्क परिवहन की सुविधा उपलब्ध करवाई गई। 1 मई 2002 से राहत कार्य प्रारंभ किए गए इसमें 1.61 लाख श्रमिको को रोजगार उपलब्ध कराया गया। केन्द्र सरकार से अब तक 2 लाख मेट्रिक टन गेहूँ दिया गया। सभी ग्राम पंचायतों में 5 क्विटंल अनाज रखावाकर अभाव की स्थिति में भी भूख का पुख्ता इंतजाम किया व मरने नहीं दिया।

9. पर्यटन:- पर्यटन को राज्य में जन उद्योग के रुप में स्थापित एवं विकसित किए जाने हेतु 27 सितम्बर, 2001 को पर्यटन नीति घाषित। पर्यटन हेतु 10वीं पंचवर्षीय याजना में कुल 147.5 करोड़ रुपये व्यय करने की स्वीकृति दी गई। वर्ष 98-99 से 2002 तक पर्यटन स्थलों व प्राचीन इमारतों के विकास एवं संरक्षण की महत्वपूर्ण योजना के तहत 38 विस्तार एवं विकास करवाए गए जिन पर 380.93 लाख रुपया खर्च किया गया। वर्ष 2002 में भरतपुर के केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान को श्रेष्ठ प्रबन्धित पर्यटन स्थल का राष्ट्रीय पुरस्कार। इसी वर्ष पैलेस ऑन व्हील्स विश्व की श्रेष्ठ पर्यटन रेलों में चयनित। पर्यटन व होटल उद्योग को बढ़ावा देने हेतु अजमेर व उदयपुर में फूड क्राफ्ट इंस्टीट्‌यूट एवं जोधपुर में होटल प्रबंधन संसधान की स्थापना की गई। जयपुर की हैरिटेज सिटी के रुप में पहचान बनाने के उद्देश्य से यूरोपियन कमीशन दव्ारा 2 करोड़ 25 लाख रुपये की हैरिटेज वॉक परियोजना स्वीकृत।

10. अन्य विकास:-प्रथम चरण में 4173 नए पुस्तकालय व वाचनालयों की स्थापना एवं दव्तीय चरण में उन्हें बढ़कार 5016 नए पुस्तकालय करने की मांग। प्रत्येक ग्राम पंचायत का एक ज्ञान जानकारी केन्द्र बनाने का विस्तार। कारगिल युदव् में शहीदों के परिजनों को 1 लाख रुपये की नकद सहायता राशि साथ ही इंदिरा गांधी नहर परियोजना की 25 बीघा सिंचित भूमि अथवा राजस्थान आवासन मंडल का पांच लाख मूल्य का एक मकान उपलब्ध कराया। 26 शहीद सैनिकों के बच्चों को नि:शुल्क शिक्षा, 148 शहीद परिवारों को रोडवेज यात्रा पास जारी। विधवाओं की सहायता राशि 350 से बढ़कार 700 रुपये प्रतिमाह की गई। अन्तरराष्ट्रीय राजस्थानी सम्मेलन 2000 में जयपुर में आयोजित किया गया। 50 वर्ष पूर्ण होने पर 1999 को राजस्थान स्वर्ण जयंती वर्ष घोषित किया गया व उसे 31 मार्च 2001 तक बढ़ाया गया। स्वतंत्रता सेनानियों की पेंशन 1000 रुपये से बढ़ाकर 1500 रुपये करी गई। राज्य की सांस्कृतिक नीति बनाने के प्रस्ताव जारी किए गए। जयपुर में फिल्मसिटी की स्थापना हेतु 1300 बीघा जमीन आरक्षित करवाई गई। राजस्थान संगीत नाट्‌य अकादमी दव्ारा जोधपुर में लोक कला संग्रहालय की स्थापना की गई।

गत पाँच वर्षों के भीषण अकाल व भयावह की स्थिति के बावजूद भी जिस प्रकार हमारे राज्य ने प्रगति सोपान पर कार्य करा है उससे यह स्पष्ट हो जाता है कि विपरीत परिस्थितियों में भी हमने अपने हिम्मत व साहस के बल पर परिश्रम की सीढ़ियों पर चढ़कर निश्चित ही नए-नए आविष्कार को जन्म दिया व हमारी ढहती हुई अर्थप्रणाली के तंत्र को ओर भी सुदृढ़ बनानें में भागीदारी दी है। कवि ने सत्य ही कहा है-

”वह पथ या पथिक कुशलता क्या

जिसमें बिखरे शूल न हो,

नाविक की धैर्य परिक्षा क्या,

जब धाराएँ प्रतिकूल न हो।”

इन सभी प्रतिकूल धाराओं को सहजता से लेते हुए हमने एक सुदृढ़ राज्य के निर्माण में अपना एक अमीट सहयोग प्रदान किया है। इस पर बस यही विचार उदरित होता है-

”आज हैं विकास के पाँच वर्ष

आज हैं आत्मनिर्भता के पाँच वर्ष,

आज हैं नि:स्वार्थता के पाँच वर्ष,

आज हैं हमार विजय के पाँच वर्ष।”

इसी विजय पताका के क्रम को निरन्तर बढ़ाते हुए हम इस राज्य के सर्वांगीण को ओर सुदृढ़ बनाते हुए अधिक से अधिक कार्य क्षेत्रों में अपना परचम स्थापित करते हुए ’सुनहरे राजस्थान की सुनहरे रेती’ को विश्व पन्नों पर अंकित करना हमारा उद्देश्य ही नहीं अपितु हमारा कर्त्तव्य है। आशा है, इस कर्त्तव्य को हम सभी पूर्ण परिश्रम से संचित कर एक नई सुबह का आगाज़ करेंगे।

”जगी नवीन ंज़ंदगी

विनाश मौन सो रहा,

नई सुबह खिल रही

नया विकास हो रहा।”

जय हिन्द! जय राजस्थान!