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अपराधी राजनेता (Corrupt Politicians - Bleak Future of India - Essay in Hindi) [ All Updates ]

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प्रस्तावना: - महात्मा गांधी ने कहा था अनुशासित व स्वच्छ राजनीति सबसे बढ़िया व्यवस्था है, लेकिन इसके विपरीत व्यवस्था होने पर यह अराजकता को जन्म देती है। आज राजनीति अपराधियों की पनाह बन गई है। मौजूदा कानून-व्यवस्था की कमजोरियों का फायदा उठा कुछ अपराधी कानून निर्माता की कुर्सी पर जा बैठे। कोई दल पाक-साफ नहीं। सभी के दामन पर दाग हैं। इसे ठीक करने की चाबी विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और मतदाताओं के पास है। बस, जरूरत है उसे ठान लेने की। बिहार चुनावों में जीते 142 विधायकों पर आपराधिक केस दर्ज हैं। अगले वर्ष 5 राज्यों में चुनाव हैं। विधायिका, कार्यपालिका व न्यायपालिका यह सकंल्प ले कि दागियों पर शिकंजा कसें। जरूरत के अनुसार नए कानून भी बनें और यह सुनिश्चित हो जाए कि आज के बाद एक भी दागी संसद या विधानसभा में नहीं पहुंच सके।

बिहार: - यहां पर चुनाव परिणामों के बाद एक बार फिर से बड़ी संख्या में अपराधियों के चुने जाने को लेकर बहस छिड़ गई है। यह पहला मौका नहीं है कि जब विभिन्न आरोपों में घिरे कई जन माननीय बन गए। हैं। लोकसभा चुनाव के समय भी कई आरोपी चुनकर संसद में पहुंचे है। हालांकि, अपराधियों के चुनाव लड़ने को लेकर कानून बने हैं। उन कानूनों के चलते लालू प्रसाद यादव चुनाव नहीं लड़ पाए। राशिद मसूद को जेल जाना पड़ा। जयललिता को मुख्यमंत्री पद से हाथ धोना पड़ा, लेकिन बड़ी अदालत के फेसले ने उन्हें राहत दी और वे फिर से मुख्यमंत्री बन गई। लेकिन इसके बाद कानून में कई पेंच होने के चलते अपराधी आज भी सांसद और विधायक चुने जा रहे हें। हालात चिंताजनक हैं। अच्छा हो लोकतंत्र के मंदिर में कम आरोपी या अपराधी चुनकर आए। इससे हमारा लोकतंत्र और मजबूत होगा। लेकिन इसके लिए नया कानून बनाना होगा। कानून बनाने वालों को इसकी पहल करनी चाहिए। कानून हमारी संसद बनाती है। वहां पहुंच महामहिम यदि पहल करेगे तो निश्चित रूप से ऐसा कानून बनेगा जिसमें चार्जशीट वाला व्यक्ति भी चुनाव नहीं लड़ पाएगा।

चार्जशीट: - हालांकि चार्जशीट दायर होने के बाद चुनाव लड़ने पर रोक का मामला सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है। इस पर सीधे कुछ कहना ठीक नहीं होगा। लेकिन सवाल यही उठता है कि आखिर यह व्यवस्था कब बनेगी जब कोई भी चार्जशीट वाला व्यक्ति चुनकर सदन में न पहुंचे। चार्जशीट दाखिल होने का मतलब कि आरोपित के खिलाफ कोई ना कोई ऐसा सबूत होगा, जिसके आधार पर चार्जशीट दाखिल की गई है। ऐसे में फैसला होने तक दागी के चुनाव लड़ने पर रोक लगनी चाहिए। अगर आरोपित बेकसूर होगा तो उसे फिर मौका मिलेगा। लेकिन ऐसा होता है नहीं। दागी कमजोर कानून का फायदा ले चुनाव जीत संसद या विधानसभा में पहुंच जाता है। और जब तक फैसला आता है कि वह सदन के पूरे लाभ लेने के साथ जनता पर रौब डालने में सफल रहता है। ऐसे दागयाेिं के चुनकर आने से हमारा लोकतंत्र कमजोर होता है।

आपराधिक मामले: - 186 सांसदों पर दर्ज हैं आपराधिक मामले, 111 सांसदों पर है गंभीर आपराधिक मामले, 1298 विधायकों पर आपराधिक मामले (2013), 15 सांसद शिवसेना के जिन पर आपराधिक केस, कुल 18 सांसद चुने गए हैं। 8 कांग्रेस के सांसदों पर मामले दर्ज, कुल 44 सदस्य। 98 सांसद हैं भाजपा के जिन पर आपराधिक मामले लंबित, पार्टियों में पहले नंबर पर। 31 सांसद हैं महाराष्ट्र के जिन पर हैं देश में सबसे ज्यादा लंबित आपराधिक मामले हैं। दंगा भड़काने के आरोप में 87 सांसद हैं।

अन्य देश: - अमरीका-दागियों का चुना जाना संवैधानिक रूप से मुश्किल है। इसमें वाटरगेट, ईरान-कोंट्रा, क्लिंटन स्कैंडल सुर्खियों में रहे हैं

  • इंग्लैंड- चुनाव आयोग सतर्क। सजायाफ्ता चुनाव नहीं लड़ सकते।
  • जापान-इस विकसित देश का विरोधभासी तथ्य है यहां व्याप्त राजनीतिक भ्रष्टाचार। दोष साबित तो चुनाव नहीं लड़ सकते है।
  • रूस- वर्ष 2005 में पारित संशोधन। दोषी साबित होने पर सजा के अनुसार अलग अवधि के लिए चुनाव पर रोक।

सुधार: - राजनीति में अपराधियों का प्रवेश वर्जित करने के लिए तीन स्तरों पर सुधार की प्रक्रिया को तेज करने की जरूरत है। सजगता और राष्ट्र निर्माण की अवधारणा को प्राथमिकता देने से हम वांछित लक्ष्य पा सकते हैं।

  • विधायिका - चार्जशीट दर्ज होने के बाद ही लग जाए रोक-

किसी नेता के खिलाफ आपराधिक मामले में चार्जशीट दाखिल होने के बाद निस्तारण होने तक चुनाव लड़ने पर रोक लगे। इस संबंध में कानून बने, आखिर कोर्ट ने चार्जशीट को स्वीकार करने की स्थिति में ये पाया है कि अपराध का संज्ञान तो बनता है। इस दिशा में नेताओं को भी अपना नैतिक चरित्र ऊंचा रखना होगा। वाद निस्तारण तक इस्तीफा दें।

  • न्यायपालिका- लंबित मामलों का हो समयबद्ध निस्तारण-

दागी नेताओं से जुड़े मामलों का समयबद्ध निस्तारण सुनिश्चित हो। सुप्रीम कोर्ट आदेश दे चुका है कि नेताओं के आपराधिक मामलों का एक वर्ष के भीतर निस्तारण हो। जिससे कि नेताओं को सियासत में टिके रहने का कोई बहाना ना मिले कि मामला लंबित है। एक सर्वे के मुताबिक देश में नेताओं के खिलाफ मामलों के निस्तारण में कम से कम 7 वर्ष लगते हैं।

  • मतदाता- स्वच्छ लोकतंत्र की चाबी है हमारे पास-

आम मतदाता में जागृति से राजनीति में स्वच्छता को सुनिश्चित किया जा सकता है। चुनने का अधिकार मतदाता के पास है। लोकतंत्र की चाबी इसी नायक के पास है। जो भी दागी किसी तरह चुनाव प्रक्रिया में आए उसे पूरी तरह से नकार दें। राजनीतिक दलों के पास स्पष्ट संदेश जाए। मतदाता अपनी ताकत का इस्तेमाल ओर न कर पाएं।

उपाय: -मुख्य चुनाव आयुक्त को और अधिक अधिकार दिए जाएं-

  • राजनीति में अपराधी को प्रवेश कतई नहीं दिया जाए इसके लिए नए प्रावधानों के साथ-साथ मौजूदा का कड़ाई से पालन हो।
  • चनाव से पहले उम्मीदवार की ओर से अपने बारे में जारी की गई प्रत्येक जरूरी सूचना यदि गलत साबित होती है, तो उसे जेल भेजा जाए और जुर्माना भी लगाया जाए।
  • चुनाव हारने के बाद भी यदि कोई नेता आपराधिक मामले में दोषी साबित होता है तो उसकी पेंशन को भी रोका जाए। इससे राजनीति में अपराधीकरण पर प्रभावी अंकुश लग जाएगा।
  • अन्य मुद्दों पर सरकारें अध्यादेश लाने की आपाधापी में रहती हैं, जबकि चुनाव सुधारों के बारे नए कानून बनाने पर शिथिलता बरतती है। ये परिपाटी टूटनी चाहिए।

बयान: - कई नेताओं ने निम्न बयान दिए हैं-

  • लोकतंत्र में ये जरूरी है कि सरकार में ऐसे चुने हुए जनप्रतिनिधि हों, जो किसी गंभीर आपराधिक मामले में लिप्त न हो। दीपक मिश्रा, जस्टिस सुप्रीम कोर्ट
  • राजनीति अपराधीकरण से हमारी समूची व्यवस्था दूषित हो गई है। अब आमजन ही इस पर अपने वोट से लगाम लगाए। सोमनाथ चटर्जी, मार्च 2009 में बोले
  • संसद अपराधियों से मुक्त होगी। दागियों की खाली सीटों पर उपचुनाव कराए जाएंगे। विधानसभाओं में भी ये ही होगा। नरेंद्र मोदी, 5 मई 2014 का बयान
  • अपराध में राजनीति के गठजोड़ से हालात गंभीर हो गए हैं। इससे लोकतंत्र पर खतरा उत्पन्न हो गया है। सोनिया गांधी, 6 मार्च 1999 में बयान

फैसला: - जो विधायक-सांसद हत्या या भ्रष्टाचार जैसे संगीन आपराधिक मामलों में कोर्ट में चार्जशीट हैं, उनको अयोग्य घोषित किए जाने के लिए कानून नहीं बनाया गया है। जबकि 10 मार्च 2014 को सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि विधायक-सांसदों के कोर्ट से चार्ज फ्रेम होने के साल भर बाद मामला तय हो जाए। पर डेढ़ साल बीत गए किसी के कान पर जूं नहीं रेंगी। राज्य सरकारों ने ऐसे लोगों की जानकारी तक एकत्र नहीं की है। आरटीआई में जानकारी ही नहीं देते कि केस के निस्तारण की क्या स्थिति है? सुप्रीम कोर्ट आदेश करता है, विधानसभाएं रद्दी की टोकरी में डाल देती हैं।

ऐतिहासिक निर्णय: - 10 जुलाई, 2013 को सुप्रीम कोर्ट ने लिली थॉमस-लोकप्रहरी बनाम भारत सरकार के मामले में फेंसला दिया। इसमें कहा कि किसी अपराधी सांसद-विधायक (एमएलए-एमएलसी) को कम से कम दो साल की सजा मिलते ही, उसकी सदन से सदस्यता छिन जाएगी। भले ही उच्च कोर्ट में उसकी अपील लंबित क्यों न हो। इसका नतीजा भी जल्द देखने को मिला। लालू यादव और राशिद मसूद और जगदीश शर्मा, तीनों सांसदो को ज्यों ही सजा मिली तो उनकी सदस्यता खत्म हो गई थी। देश को लगा कि राजनीतिक सफाई का सपना सच हाेेने लगा। पर उसी दौरान इसके हकीकत बनने में रोडा डालने का इंतजाम भी कर लिया गया था। दरअसल, उस फेसले के बाद कानून मंत्रालय ने एटॉर्नी जनरल की राय लेकर यह कहा था कि विधायक-सांसद की सीट रिक्त होने और अपात्रता के बारे में नोटिफिकेशन संबंधित सदन के सचिवालय को जारी करना है। पर उसमें विलंब होने की आशंका के कारण सुप्रीम कोर्ट से इस बारे में निर्देश मांगे गए तो कोर्ट ने कहा कि यह प्रक्रिया जल्द अपनाई जाए। पर ऐसा पूरा हुआ नहीं। विधायक सांसद की सीट रिक्त होने के बारे में नोटिफिकेशन जारी करने में विलंब के कारण वह फैसला तब निष्प्रभावी हो गया जब उत्तर प्रदेश के मंत्री कैलाश चौरसिया ने अपनी सदस्यता बरकरार रखी।

दरअसल, 28 फरवरी 2015 को चोरसिया को एक दशक पुराने मामले में तीन साल की सजा हुई थी। अब सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के हिसाब से चौरसिया की सदस्यता खत्म और वे अपात्र घोषित हो जाने चाहिए थे। पर चौरसिया के मामले में सजा तो हो गई पर सरकार ने उस मामले को दो हफ्ते तक जानबूझकर लटकाए रखा और आखिरकार 13 मार्च को चौरसिया सजा पर स्थगन ले गए।

स्पीकर: - लोकप्रहरी और लिली थॉमस के मामले में जो ऐतिहासिक निर्णय लिया है, वह सरकारी मिलीभगत से निष्प्रभावी होता दिख रहा है। दरअसल, अभी स्थिति यह है कि किसी विधायक को सजा मिलने पर सत्ताधारी पक्ष द्वारा विधानसभा स्पीकर पर विधायक की सदस्यता खत्म करने संबंधी नोटिस न जारी करने का दबाव बनाया जा सकता है। स्पीकर अधिकांशत: सत्ता पक्ष का ही होता है तो स्पीकर सचिव को नोटिस जारी ही नहीं करने देगा। तब तक वह विधायक ऊपरी अदालत से स्थगन (स्टे) ले आएगा। इस प्रकार अपराधियों ने एक रास्ता ढूंढ लिया गया है। यानी कोर्ट के ’आर्शीवाद’ से दागी नेता बने रहेंगे। कैलाश चौरासिया के मामले ने दागियों को राह दिखा दी है। चौरसिया ने कानून को बेवकूफ बनाकर वहां सदस्यता कायम कर ली है।

उपसंहार: - चुनाव आयोग ने राज्यों के मुख्य सचिव को कहा था कि ऐसे मामलों में तुरंत नोटिफिकेशन जारी होने चाहिए पर आयोग ने भी इसे छोड़ दिया है विधायक को वक्त मिलने से वह ऊपरी कोर्ट से स्टे ले लेगा। पर सवाल यह है कि कोर्ट का स्टे भी रेट्रोस्पेक्टिव प्रभाव से सदस्यता को बहाल नहीं कर सकता है। पर चौरसिया के मामले में ऐसा हुआ है। उसने कानून को धता बताकर अपनी सदस्यता जारी रखी है उसने विधायकों संबंधी अनुच्छेद 190 - 191 के प्रावधानों को और सुप्रीम कोर्ट को निर्णय ठेंगा बता दिया है। इससे अपराधीकरण रोकने का प्रयास धुल गया है। ऐसे अपराधी नेताओं को हमें किसी भी तरह आगे राजनेता बनने से रोकना होगा नहीं तो देश में अपराध ओर अधिक बढ़ जाएगा।

- Published on: December 17, 2015